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ऐ मौत तू भी तो..........

 *ऐ मौत तू भी ममता का एक सुहाना रुप है.* ऐ मौत तू यूँ ही साथ मे चला कर कभी हमसाया बनकर चल तो कभी सर पे मंडराया कर. तेरा साथ रहना ये याद दिलाता है एक हम यहा मुसाफीर है और तू अंतिम सत्य है. कुदरत का दिया हुआ आँखो मे समेटूं तो कैसे? पलकोंको भी तो मूँद नही पाता हूँ. और ईसी चक्कर मे तुझे देखना भूल जाता हूँ. पर ऐ मौत तू है, क्यूँ की तेरा दीदार वैसे तो ईस साल भर मे दो बार हुआ है और वैसे भी तो वो होते रहता है. कभी सडक के मोड पर तो कभी ईधर तो कभी उधर. हम अपनी ही जिंदगी मे ईतने व्यस्त रहते है की तू साथ चल रही है पर तुझे हम महसूस नही कर पाते है. तुझसे ही जितने की होड़मे  बार बार तुझसे टकराते रहते है. जिंदगी भर की दौड धूँप से थके हारे एक दिन तेरी ही गोद मे सर रख कर शांत सो जाना है. ऐ मौत तू भी  ममता का ही तो एक सुहाना रुप है. तेरी आँचल मे जो शांती और सुकून है वो और कहाँ है? © पुष्कराज चव्हाण. रहेजा अस्पताल १०/०४/२०२१